Friday, 21 February 2014

महंगाई का साम्राज्यवाद



महंगाई का साम्राज्यवाद-हिन्दी लेख (mehangai ka samrajya-hindi lekh

 
 
 
 
 
 
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         अमेरिका के प्रतिवेदनों पर भारतीय प्रचार माध्यम इतना हल्ला क्यों मचाता है? ऐसा लगता है अमेरिका दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस है जो उनका गोपनीय प्रतिवेदन लिखता है। मजे की बात यह है कि जिन लोगों का गोपनीय प्रतिवेदन प्रतिकूल होता है वह कभी उसका विरोध नहीं करते और जिनका प्रशंसनीय है वह उछलने लगते हैैं। कभी कभी तो यह देखकर हैरानी होती है कि शिखर पुरुषों के दिल का हाल उनके देश के लोग तक नहीं जान पाते पर अमेरिका राजनयिक को पता लग जाता है वह भी उनके ही श्रीमुख से! खंडन होना चाहिए पर होता नहीं। कई बार तो निंदा योग्य बयानों की भी निंदा नहीं होती।
          अभी तक वामपंथी बुद्धिजीवियों से अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोध करने का नारा सुनते थे मगर तब यह समझ में नहीं आता था कि आखिर यह है किस प्रकार का! दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवियों ने पूंजीवाद और अमेरिका का विरोध एक साथ किया है इसलिये हमेशा ही उनके बारे में भ्रमपूर्ण स्थिति रही है। चूंकि वामपंथी पूंजी पर राज्य के नियंत्रण की बात करते हैं तो भारतीय समाज उसे स्वीकार नहीं करता। इसका कारण यह है कि राज्य के नियंत्रण से भी देश का कोई भला नहीं हुआ! फिर आज की कंपनी प्रणाली जरूर ब्रिटेन और अमेरिका की देन हो पर समाज में पूंजी और श्रम की अपनी स्वायत्ता तो भारतीय अर्थशास्त्र की ही देन है। राज्य को अनियंत्रित पूंजी के मद से उपजे अपराध तथा श्रम का शोषण रोकने का अधिकार तो भारतीय अर्थशास्त्र मानता है पर वह उनका निंयत्रणकर्ता होना उसमें स्वीकार नहीं है। यहीं आकर भारतीय समाज वामपंथियों से छिटक जाता है क्योंकि उसको लगता है कि उसकी आर्थिक और श्रमशील गतिविधियों पर राज्य का नियत्रंण नहीं होना चाहिए। यही कारण है कि अमेरिकी साम्राज्यवाद का प्रतिरोधक होने का दावा करने वाले वामपंथी कभी भारतीय समाज में स्थान नहीं बना पाये।
           दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी अमेरिकी साम्राज्य के भौतिक स्वरूप का ही बखान करते हैं। उसने जापान पर बम फैंका, उसने जर्मनी को रौंदा तथा वियतनाम पर हमला किया, तथा उसने अफगानिस्तान पर हमला किया तथा इराक पर हमला किया आदि बातें कहकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज को आंदोलित करने का प्रयास किया मगर अभौतिक या अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका ने जो कारगुजारियां की इसकी चर्चा नहीं की।
             वामपंथी अब भी कहते हैं कि अमेरिका साम्राज्यवाद फैला रहा है! इसका मतलब वह केवल इतिहास में जीते हैं। सच बात तो यह है कि अमेरिका सभी जगह राज्य कर रहा है। वामपंथी बुद्धिजीवियों ने हमेशा ही इतिहास सुनाया है-यह हो गया, वह हो गया, इसलिये अब यह होगा और वह होगा। प्रतिरोध करने के नाम पर चंद नारे लगा लिये और कभी कभार प्रदर्शन कर लिया। यह देखा ही नहीं कि अमेरिका धीरे धीरे अब दुनियां भर के शिखर पुरुषों का बॉस बनता जा रहा है।
         अपने प्रचार माध्यमों ने हद ही कर दी है। अमेरिका किसी भी देश के शिखर पुरुष का गोपनीय प्रतिवेदन जारी करता है तो अपने यहां के प्रचार माध्यम उसे ऐसे उठाये घूमते हैं जैसे कि इस नये वैश्विक ब्रह्मा ने कोई नयी बात कर दी हो। दरअसल हमारे देश के प्रचार माध्यमों का आधार पूंजी है और जिसका उद्गमा स्थल ऐसा लगता है अमेरिका है। सभी विकासशील देशों के आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक शिखर पुरुष अमेरिका पैसा भेजते हैं पर वह विनिवेश होकर यहां आता है। आर्थिक और सामाजिक शिखर पुरुषों की बात तो छोड़िये हमारे देश के धार्मिक पुरुष भी अमेरिका के अनुयायी लगते हैं। इनमें से कई अपने शिष्यों को दर्शन देने अमेरिका जाते हैं।
        वामपंथी बुद्धिजीवी भारत में बढ़ती महंगाई का राज नहीं जान पाये। क्या उनको नहीं है कि इस देश में पांच सौ और हजार के नोट के लिये आसानी से प्रचलन में रहें इसके लिये महंगाई योजना पूर्वक बढ़ाई जा रही है। देश की कंपनियां आम जनमानस को अपनी जेब में पांच सौ और हजार के नोट जेब में घूमते देखना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्व के विकासशील देशों में पेट्रोल की आड़ में महंगाई खेल हो रहा है। कम से कम भारत में तो स्थिति अजीब है। इधर सुनने में आ रहा था कि पेट्रोल के दाम गिरेंगे पर भारत कंपनियों ने फिर उसे बढ़ा दिया।
          भारत से रुपया बाहर जाता है तो डालर बन जाता है। अगर मान लीजिये किसी ने आज एक हजार रुपये अमेरिका या अन्य देश की बैंक में जमा किया तो उसके खाते में बीस डॉलर जमा होंगे। काला धन जमा करने वालों ब्याज तो मिलना दूर उनको रखने के पैसे भी देने पड़ते हैं-ऐसा हमने प्रचार माध्यमों में पढ़ा और सुना है। अगर भारतीय रुपया स्थिर रहा तो यह बीस डॉलर देश में आयेंगे एक हजार के रूप में। अगर रुपया गिरा तो विदेश में काला धन जमा करने वाला को ही लाभ होता है। समझ लीजिये साठ रुपये के मुकाबले एक डालर का मूल्य निर्धारित हुआ तो यह बीस डॉलर बारह सौ रुपये हो जायेंगे। इसी तरह भारतीय जमाकर्ता फायदे में रहेगा।
         फिर विदेश रुपया भेजने के लिये मोटी रकम होती होगी। अक्सर कहा जाता है कि हजार पांच सौ रुपये के नोट से मुद्रा का आवागमन सुविधाजनक होता है-यह अलग बात है कि हमारे यहां अभी भी अनेक लोग इसे देख भी नहीं पाते होंगे। अगर भेजी जाने वाली रकम सौ या पचास रुपये की होगी तो ढेर सारे ड्रम भर जायेंगे। इसलिये हजार रुपये का नोट ज्यादा उपयोगी है। मुश्किल दूसरी है कि हजार और पांच सौ के नोट छोटी वस्तुओं के खरीदने में अभी पूरी तरह सहायक नहीं है। इसलिये यह लगता है कि इस देश को हजार और पांच सौ नोट के लायक बनाया जा रहा है।
इतना ही नहीं हम देख रहे हैं कि हर क्षेत्र के शिखर पुरुष का ध्यान भारत पर कम अमेरिका पर अधिक रहता हैं। वहां का राष्ट्रपति क्या कह रहा है? वहां का अखबार क्या लिख रहा है? अमेरिका की भारत के शिखर पुरुषों बारे में क्या सोच है? इस पर भारतीय प्रचार माध्यम उछलते हैं। तय बात है कि प्रचार माध्यमों के मालिकों का कहीं न कहीं झुकाव अमेरिका के प्रति है तभी तो उनके कार्यकर्ता उसका प्रचार करते हैं।
        भारत के विकास का दावा संदेहास्पद भी इसी कारण से हो रहा है क्योंकि यहां सौ रुपये से ऊपर की मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा है। याद रखिये हमारी जानकारी के अनुसार किसी भी विकसित देश की मुद्रा सौ से अधिक की नहीं है।
दरअसल वामपंथी बुद्धिजीवी इतिहास का रोना रोते हुए अमेरिका को कोसते हैं पर नारों से आगे नही जाते। अपने वाद का झंडा उठाये हुए अमेरिका के रणनीतिकारों की चालाकियों को भांप नहीं पाते। वह भारतीय संदर्भों की बजाय विदेशी संदर्भों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। अमेरिका और कंपनी दैत्य किस तरह विश्व के आम जनमानस को त्रस्त कर रहा है इसका आभास नहीं है। अफगानिस्तान और इराक में उसकी सैन्य उपस्थिति पर हल्ला मचाने वाले भारतीय वामपंथी बुद्धिजीवी देश के अंदर ही स्थित अमेरिका के कंपनी दैत्य पर नज़र नहीं रख पाते। देश के आम आदमी को पांच सौ और हजार के नोट के उपयोग लायक बनाने की जो योजना चलती दिख रही है उसका आभास हमें इसलिये भी होता है कि दिन ब दिन महंगाई इस कदर बढ़ रही है कि आने वाले समय में समाज का निम्न मध्यम वर्ग भरभर्राकर ढहते हुए गरीबी की रेखा के नीचे जाता दिख रहा है। मध्यम वर्ग गरीब होता जा रहा है तो उच्च मध्यम वर्ग तरक्की कर अमीर बन गया है। यह विषम आर्थिक स्तर देश के समाज को किस तरह नष्ट करेगा इसका अनुमान किसी वामपंथी बुद्धिजीवी ने शायद ही किया हो।

इधर हिन्दी दिवस आने वाला है और उधर देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस चल रही है।

    इधर हिन्दी दिवस आने वाला है और उधर देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर बहस चल रही है। किसी एक कार्टूनिस्ट को कथित रूप से देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। इससे भारतीय बौद्धिक जगत में उत्तेजना का प्रचार पूरे देश के टीवी चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं में हो रहा है। भारत के अंग्रेजी छाप बुद्धिजीवी याचक बनकर अभिव्यक्ति की आजादी का नारा लगा रहे हैं तो उनके अनुयायी हिन्दी विद्वान भी उनके पीछे हो लिये हैं। हिन्दी के लेखक और विद्वानो की त्रासदी यह है कि वह अंग्रेजी की सामग्री का अनुवाद कर लिखें तो कोई बात नहीं पर वह तो सोच का भी अनुवाद अपने मस्तिष्क करते हैं। वह ऐसे ही सोचते हैं जैसे कि अंग्रेजी वाले उनके लिये प्रेरक ढांचा बनाते हैं। इसका कारण यह है कि प्रतिष्ठित हिन्दी लेखक और विद्वान अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे होकर सोचते और लिखते हैं। अंग्रेजी भाषा हो प्रवृत्ति हमें गुलामी की तरफ ले जाती है इसलिये हिन्दी वाले केवल नारे लगाते हुए रह जाते हैं।
         इस विषय पर लिखने का मन नहीं था। कारण यह कि हमारे लेख जिस तरह चुराये जाते हैं उससे सदमा लगता है। प्रकाशन तथा प्रसारण माध्यमों में स्थापित विद्वान और लेखक हम जैसे अप्रसिद्ध लेखकों के विचार चुराकर भी लिखते हैं। खैर, यहां हिन्दी में अभिव्यक्ति की आजादी के समर्थन में नहीं लिखा जा रहा है। लिखने और बोलने वालों को आजादी दो यह नारा नहीं लगाया जा रहा है। हम तो यहां स्पष्ट रूप से यह कहना चाहते हैं कि आम आदमी की निजता का सम्मान होना चाहिए। अभी हाल ही में पंजाब में एक लड़की को पुलिस वालों ने पूछताछ के लिये रोका उसके साथ लड़का था। उसी समय एक टीवी चैनल के दल ने अपनी सनसनीखेज खबर बनाने के लिये अपना कैमरा वहां लगा दिया। लड़की ने कैमरे का विरोध किया पर चैनल वाले नहीं माने। वह लड़की वहां से भागती चली गयी और कुछ देर बाद ही उसने रेल से कटकर आत्महत्या कर ली। यह उस आम लड़की की निजता पर प्रहार था जिसे किसी हालत में भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां अभिव्यक्ति की आजादी पर वही लोग प्रहार करते दिखे जो आज उसकी याचना के लिये नारे लगा रहे हैं। आजकल लड़के लड़के परेशान हाल हैं। ऐसे में अगर उनमें कोई आपस व्यक्तिगत तालमेल बनता है तो यह उनकी निजी अभिव्यक्ति है। उनका पीछा करना अभिव्यक्ति पर प्रहार है। अलबत्ता प्रचार माध्यमों को सार्वजनिक विषयों, संगठनों और व्यक्तियों पर सभ्यता के दायरे में की गयी टिप्पणियों से रोकना नहीं चाहिए। दूसरी बात यह कि जो सार्वजनिक क्षेत्र में – जिसमें निजी कंपनियां, संगठन तथा कला साहित्य से जुड़े लोग भी शामिल हैं-उन लोगों को अपने अंदर सहिष्णुता पैदा करने का प्रयास करना चाहिए। उनका मजाक भी बन सकता है और निंदा भी हो सकती है। समर्थन पर प्रसन्नता दिखाने के साथ ही विरोध का तार्किक प्रतिकार का सामार्थ्य हो तो ही सार्वजनिक क्षेत्र में आयें नहीं तो घर बैठकर निजी उद्यम कर अपना जीवन निर्वाह करें।
               देश के हर नागरिक को देश के झंडे, संविधान, न्यायपालिका तथा महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों को सम्मान से देखना चाहिए यह बात ठीक है मगर यह भी सच है कि जो व्यक्ति जिस विषय से प्रसन्न होता है उसकी प्रशंसा करता है जिससे अप्रसन्न होता है उसे गालियां देता है या मजाक बनता है। हम जैसे लोग देश के संविधान, झंडे और न्यायपालिका का सम्मान करते हैं क्योंकि हमें इससे अपने परिवार तथा संपूर्ण समाज का हित होता दिख रहा है मगर जिनको इससे अपना या समाज का हित नहीं दिखता उनका क्या? हम जैसे लोग उनकी मजाक की निंदा करेंगे उनको विरोध में तर्क देंगे पर यह कभी नहीं चाहेंगे कि उनके खिलाफ कोई दैहिक या मानसिक प्रताड़ना वाली कार्यवाही हो। सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोग सभी को प्रसन्न नहीं रख सकते। संविधान सभी के हित की बात करता है पर इतने बड़े देश में ऊंच नीच होता रहता है। न्यायाधीश लोग सबूत के आधार पर निर्णय देते हैं। ऐसे में उनके निर्णयों में किसी को गुण तो किसी को दोष भी दिख सकता है। जिसके पक्ष में फैसला आता है वह प्रसन्नता से सत्यमेव जयते बोलता है और जिसके विपक्ष में आता है वह असत्यमेव जयते की दुहाई देता है। चाहे कुछ भी यह उसकी अभिव्यक्ति है। उसे सहजता से बहते देना चाहिए।
           यह आजादी का प्रश्न नहीं है वरन् असंतुष्ट आदमी की अभिव्यक्ति रोकना ही अपने आप में अनुचित कार्य है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र में सक्रिय लोगों को आमजनों में अपने समर्थन तथा विरोध के साथ ही मजाक सहन करना पड़ सकता है। ऐसी मनस्थिति के लोग ही सार्वजनिक क्षेत्र में आकर काम करें, कंपनियां बनायें या कला साहित्य से जुड़ी समितियां उनको अपने अंदर सहिष्णुता पैदा करना होगी। यह बात कोई विद्वान नहीं कह पा रहा है। इसका कारण यह कि हिन्दी जगत में प्रायोजित लोगों की भरमार है और उनसे ऐसी अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। बहरहाल हिन्दी पखवाड़ा प्रारंभ हो चुका है और आगे भी इस विषय पर हम लिखेंगे।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

भ्रष्टाचार देश को डुबो देता है

पढ रहे हैं। आप अंग्रेजी या हिंदी में कमेंट वाले कालम में जरूर अपने विचार लिखें-दीपक भारतदीप्

भ्रष्टाचार देश को डुबो देता है-हिन्दी धार्मिक आलेख 

 
 
 
 
 
 
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आज हमारे देश की जो स्थिति है वह अत्यंत चिंताजनक है। राजनीति के जिन सिद्धांतों के हमारे प्राचीन विद्वानों ने स्थापित किया उनकी जगह पाश्चात्य सिद्धांतों को अपनाया गया है। जिनसे देश हालत खराब हो गयी है। राजा और राज्य प्रमुख के कर्तव्यों का मनुस्मृति में व्यापक रूप से वर्णन किया गया है। राजा या राज्य प्रमुख के दायित्वों का निर्वहन एक धर्म के पालन की तरह होता है। जब कोई मनुष्य राजा या राज्य प्रमुख के पद पर प्रतिष्ठित होता है तब उसे राज्य धर्म का पालन करते हुए अपने प्रजाजनों की चोरों, अपराधियों तथा बेईमानों से रक्षा करना चाहिए। मज़ेदार बात यह है कि मनृस्मृति के जाति तथा स्त्री संबंधी अनेक संदेशों को समझ के अभाव में बुद्धिमान लोग अनर्थ के रूप में लेते हैं। आज के अनेक पश्चिमी शिक्षा से अभिप्रेरित विद्वान तथा वहीं की विचाराधारा के अनुगामी बुद्धिजीवी इन्हीं संदेशों के कारण पूरी मनृस्मुति को ही अपठनीय मानते हैं। निश्चित रूप से ऐसे बुद्धिजीवी सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक शिखर पुरुषों से प्रायोजित और संरक्षित हैं। आज के हमारे शिखर पुरुष कैसें हैं यह सभी जानते हैं।

समय का सदुपयोग

समय, सफलता की कुंजी है। समय का चक्र अपनी गति से चल रहा है या यूं कहें कि भाग रहा है। अक्सर इधर-उधर कहीं न कहीं, किसी न किसी से ये सुनने को मिलता है कि क्या करें समय ही नही मिलता। वास्तव में हम निरंतर गतिमान समय के साथ कदम से कदम मिला कर चल ही नही पाते और पिछङ जाते हैं। समय जैसी मूल्यवान संपदा का भंडार होते हुए भी हम हमेशा उसकी कमी का रोना रोते रहते हैं क्योंकि हम इस अमूल्य समय को बिना सोचे समझे खर्च कर देते हैं।
विकास की राह में समय की बरबादी ही सबसे बङा शत्रु है। एक बार हाँथ से निकला हुआ समय कभी वापस नही आता है। हमारा बहुमूल्य वर्तमान क्रमशः भूत बन जाता है जो कभी वापस नही आता। सत्य कहावत है कि बीता हुआ समय और बोले हुए शब्द कभी वापस नही आ सकते।

भ्रष्टाचार देश को डुबो देता है

भारतीय अध्यात्म तथा दर्शन में वर्णित पाप पुण्य को अंधविश्वास इसलिये नहीं कहा जाता है कि हमारे बुद्धिजीवी कोई प्रशिक्षित ज्ञानी हैं बल्कि वह मनुस्मृति के अध्ययन से विरक्त होकर शुतुरमुर्ग की तरह अपने मन में मौजूद अपराध भावना से स्वयं छिपकर ऐसी ही सुविधा अपने आकाओं को भी देते हैं। जो राजा या राज्य प्रमुख अपनी प्रजा की चोरों, अपरािधयों तथा बेईमानों से रक्षा नहीं करता वह पाप का भागी बनता है, मगर मनु महाराज ने कभी यह सोचा भी नहीं था कि इस भारतवर्ष जैसी देवभूमि पर ही राज्य से संबंधित कुछ लोग असामाजिक, अपराधी तथा भ्रष्ट तत्वों से अपनी जनता की रक्षा बजाय उनको ही संरक्षण देकर महापाप करेंगे। जब कोई मनुस्मृति के संदेशों का विरोध करता है तो वह यकीनन ऐसे राज्य का समर्थन कर रहा है जो प्रजा की रक्षा ऐसे दुष्ट तत्वों से बचाने में नाकाम रहता है। स्पष्टतः आज के अनेक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी इसलिये ही संदेह के दायरे में आते हैं क्योंकि वह किसी न किसी ऐसे व्यक्ति का समर्थन करते हैं जो राज्य धर्म का पालन नहीं करता।

Friday, 7 February 2014

PreviousNext महिंद्रा ने पेश की इलेक्ट्रिक स्पो‌र्ट्स कार हालो

घरेलू कार निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने आज ऑटो एक्सपो में इलेक्ट्रिक कार सेगमेंट में अपनी नई एंट्री दर्ज की। महिंद्रा रेवा की इस नई कार का नाम है हालो। कंपनी ने कहा कि इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर सरकार की ओर से मिल रहे प्रोत्साहन को देखते हुए यह कार पेश की गई है, लेकिन हालो को पहले विदेशी बाजारों में पेश किया जाएगा।
महिंद्रा एंड महिंद्रा के कार्यकारी निदेशक पवन गोयनका ने कहा, 'हालो को कमर्शियल करने की योजना है, हम इसके फाइनल डिजाइन पर काम कर रहे हैं। इसे प्रोडक्शन के लिए तैयार करने में कम से कम से तीन साल का वक्त लगेगा।' हालांकि, उन्होंने कहा कि इसे पहले विदेशी बाजारों में उतारा जाएगा।
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हालो में दो दरवाजे हैं और इसमें दो लोग ही बैठ सकते हैं। डिजाइन की बात करें तो लुक बहुत कर्वी रखा गया है। कंपनी का इस बात पर जोर है कि इसे सिर्फ स्पोर्ट्स कार न माना जाए, बल्कि रोजमर्रा के इस्तेमाल लायक कार की तरह देखा जाए।
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हालो में इलेक्ट्रिक मोटर है, जिसकी क्षमता 105 किलोवाट है। कंपनी कार की बैटरी पर भी काफी काम कर रही है। कार 200 किलोमीटर प्रति घंटे तक की रफ्तार पकड़ सकती है। इसकी संभावित कीमत 30-35 लाख रुपये के बीच होगी।

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PreviousNext प्राचीन किसानों ने की ग्लोबल वार्मिग की शुरुआत

एक नए शोध में दावा किया गया है कि प्राचीन काल के किसान आठ हजार वर्षो के दौरान पृथ्वी का तापमान 0.9 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ाने के लिए जिम्मेदार थे। लगभग इतना ही वैश्रि्वक तापमान पिछले 150 वर्षो के दौरान बढ़ा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कांसिन में मौसम विज्ञानी फेंग ने कहा कि प्रारंभिक कृषि उतनी ही शक्तिशाली थी जितनी पूरी औद्योगिक क्रांति। साथ ही कहा कि शुरुआत में मनुष्यों ने कुल 0.73 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ाया था। शोध के मुताबिक शुरुआती संस्कृतियों ने कछुए की गति की भांति धीरे-धीरे हजारों साल से अधिक समय में ग्रह के वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों जैसे कार्बन डाइआक्साइड और मीथेन को जोड़कर तापमान को बढ़ाया।
औद्योगिक क्रांति के बाद समाज में खरगोश की गति की भांति जलवायु परिवर्तन हुआ। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की अंतर सरकारी पैनल (आइपीसीसी) के मुताबिक वर्ष 1880 से 2012 के दौरान वे 0.85 डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ाने के लिए जिम्मेदार रहे।
गर्म होने लगा है मौसम
आम तौर पर माना जाता है कि वैश्रि्वक तापमान बढ़ने की शुरुआत 1850 से हुई, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि वनों की कटाई और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण जलवायु परिवर्तन की शुरुआत पहले ही हो गई थी। यह शोध जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स के नवीनतम अंक में प्रकाशित हुआ है।
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अर्थव्यवस्था में निवेश को पीएसयू पर निर्भर सरकार

अर्थव्यवस्था में निवेश की रफ्तार बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार एक बार फिर से सार्वजनिक उपक्रमों [पीएसयू] के नकदी भंडार पर निर्भर हो गई है। चालू वित्ता वर्ष 2013-14 की अप्रैल से जून तिमाही में पीएसयू के निवेश की गति देख सरकार ने शेष नौ महीनों में इन्हें अपनी विस्तार योजनाओं पर अधिक से अधिक खर्च करने को कहा है। सरकार ने करीब 23 सार्वजनिक उपक्रमों को विस्तार योजनाओं पर निवेश के एक निश्चित लक्ष्य दिया है।
माना जा रहा है कि सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक उपक्रमों का नकदी भंडार जान फूंकने में मदद कर सकता है। अर्थव्यवस्था में घरेलू निवेश की कमी से परेशान सरकार ने इसीलिए पीएसयू को अपने नकदी भंडार के इस्तेमाल के निर्देश दिए थे। इन कंपनियों के पास करीब 1.80 लाख करोड़ रुपये का नकदी भंडार है।
पढ़ें : पीएसयू बैंकों में 56 हजार पद खाली
सरकार मानती है कि विभिन्न वजहों से निजी क्षेत्र फिलहाल घरेलू अर्थव्यवस्था में निवेश को लेकर उदासीन है। राजकोषीय और चालू खाते के घाटे को बजटीय सीमा में रखने की कोशिशों से सरकारी खजाने पर भी खासा दबाव है। इन परिस्थितियों में सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में ही उम्मीद की किरण दिख रही है।
केंद्र सरकार ने एनटीपीसी, ओएनजीसी, गेल, इंडियन आयल, सेल, एनएमडीसी समेत 23 कंपनियों को चालू वित्ता वर्ष में 1,41,912 करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य सौंपा है। कंपनियों को इस राशि का इस्तेमाल अपनी विस्तार योजनाओं पर करना है। प्रधानमंत्री कार्यालय [पीएमओ] ने बीते हफ्ते एक बैठक कर इन कंपनियों की विस्तार योजनाओं की समीक्षा की थी। इसमें सभी पीएसयू ने पहली तिमाही में किए गए खर्च का ब्योरा पेश किया था।
पहली तिमाही में इन सभी सार्वजनिक उपक्रमों को 25,131 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश का लक्ष्य दिया गया था। जानकारी के मुताबिक ये कंपनियां इस अवधि में 23,635 करोड़ रुपये यानी लक्ष्य का करीब 94 फीसद पूंजी निवेश अपनी विभिन्न परियोजनाओं पर कर चुकी हैं। 23 में छह कंपनियां- एनएमडीसी, पीजीसीआइएल, नेवेली लिग्नाईट, बीईएल, आरआइएनएल और एचएएल पहली तिमाही के अपने निवेश लक्ष्य को पूरा करने में सफल रही हैं। सूत्र बताते हैं कि बैठक में बाकी पीएसयू से दूसरी और तीसरी तिमाही में पूंजी निवेश के लक्ष्यों को पाने के निर्देश दिए गए हैं। इन कंपनियों ने सरकार को भरोसा दिया है कि वे तीसरी तिमाही तक पूंजी निवेश के अपने लक्ष्य को पाने में सफल रहेंगी।

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हार्ड डिस्क की तरह बर्ताव करता है बुजुर्गों का दिमाग

साइंटिस्ट्स का कहना है कि बुजुर्ग लोगों का दिमाग धीमा इसलिए चलता है क्योंकि उसमें एक कंप्यूटर के हार्ड डिस्क की तरह बहुत सारी इंफॉर्मेशन दर्ज होती है जिसे प्रोसेस करने में वक्त लगता है। ट्यूबीनजेन यूनिवर्सिटी के डॉक्टर माइकल रामस्कर का कहना है कि वक्त के साथ दिमाग में बहुत सारी जानकारी स्टोर होती जाती है, इसलिए दिमाग धीमा पड़ता जाता है।

रिसर्चरों के मुताबिक, उम्र बढ़ने पर दिमाग अक्सर धीमा पड़ते जाता है लेकिन ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि इसकी प्रोसेसिंग क्षमता उम्र के साथ कम होती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जो अनुभव इंसान अपने जीवनकाल में हासिल करता है, उसकी वजह से दिमाग में सूचनाएं उसी तरह जगह घेरती जाती हैं, जैसे की कंप्यूटर में डेटाबेस बढ़ने पर होता है। इसकी वजह से दिमाग को जानकारी प्रोसेस करने में वक्त लगता है। 


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राहुल को मनमोहन का उपदेश

सुरक्षित गोस्वामी
आजकल मनमोहन के
मन में प्रबल भावना है कि अगले चुनाव में कांग्रेस जीते और PM पद राहुल के पास आ जाए! वैसे भी ऐसा भाव होना स्वाभाविक है, जैसे पिता, पुत्र को अपने सामने आगे बढ़ता देखना चाहता है ऐसे ही गुरु भी शिष्य को उंचाइयों पर देखना चाहता है। राहुल तो मनमोहन को हृदय से अपना राजनीतिक गुरु मानते ही हैं। इसी कारण मनमोहन की इच्छा है कि मैं राजनीति की बारीकियों को राहुल को वैसे ही सिखा दूं जैसे अध्यात्म में गुरु,शिष्य को सीखाता है। गुरु, शिष्य को शिष्य नहीं बल्कि गुरु ही बनाने की कोशिश में रहता है। गुरु चाहता है कि शिष्य मेरे से भी बेहतर होता जाए।

मनमोहन कहते हैं, 'हे राहुल वैसे तो तुम पब्लिक में अच्छा बोल लेते हो लेकिन अपने बोलने की कला को दिन-प्रतिदिन निखारते जाओ क्योंकि अच्छा वक्ता होना नेता का प्रमुख गुण है। जनता की मनोस्थिति को ध्यान में रखकर भाषण दो। भाषा में ठहराव व आवाज़ में दबंगता हो। शब्द बड़े नपे-तुले व प्रभावी हों, साथ ही जो बातें जनता से करो उनको पूरा करते जाओ क्योंकि अधिकतर नेता ख्याली पुलाव बनाते रहते हैं। हे मेरे प्यारे 'हिंदी भाषा पर अपनी पकड़ बढाते जाओ। हिंदी भाषा की एक खूबी है कि इस भाषा में शब्दों के बीच में थोड़ा ठहराव होता है जिससे सुनने वाले के दिलों-दिमाग पर आपके शब्दों का असर होने लगता है, जबकि अंग्रेजी भाषा जल्दी-जल्दी बोली जाती है। राहुल, तुम इसके लिए अधिक से अधिक सभाओं में बोलते रहो और देश के प्रमुख वक्ता बन जाओ। मुझे कभी-कभी लोग इसी बात से ना पसंद करते हैं कि मैं कम बोलता हूं। इसलिए प्रिय शिष्य तुम मेरी इस कमी को अपने द्वारा पूरा कर दो तो ये मेरी गुरु दक्षिणा होगी।

राहुल, तुम हमेशा उत्साह व धैर्य में रहो और जब देशहित में कठोर कदम उठाने की बात आए तो पीछे ना हटना, भले तुम्हारा कितना भी विरोध क्यों ना हो। मैं तुमको अपने पिछले नौ सालों के PM पद का अनुभव देने को उत्सुक हूं, जिससे तुम इस कांटों से भरे तख़्त पर कभी मार ना खाओ। यहां सभी दलों को संभाल कर चलना होता है। मैं तो चाहूंगा कि हमारी पार्टी का बहुमत आए लेकिन यदि बहुमत न आया तो गठबंधन की सरकार बनेगी और सबको खुश रखना भी तुमको आना चाहिए।

स्मार्टफोन आपको बना सकता है होशियार

स्मार्टफोन के इस्तेमाल को कई लोग ध्यान भटकाने वाला मानते हैं, लेकिन एक इंडो-अमेरिकन रिसर्चर ने दावा किया है कि आपका स्मार्टफोन ध्यान बढ़ाने और एक्टिव रहने में मददगार साबित हो सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग एंड कंप्यूटर साइंस के प्रफेसर जसप्रीत सिंह के मुताबिक, स्मार्टफोन्स की वजह से लोग अपने काम पर या घर पर रहने के दौरान सचेत रहते हैं और इसकी मदद से अपने कुछ खास मकसद पूरे कर सकते हैं। सिंह ने एक बयान में कहा कि हम एक ऐसे समाज में हैं, जहां खाना, गैजेट या ज्ञान की कमी नहीं है। सिंह के मुताबिक, कमी दरअसल, हमारी सजगता में आ गई है। इंसान में आम तौर पर दबाव में भूलने की प्रवृत्ति होती है, लेकिन स्मार्टफोन मदद कर सकते हैं।

सिंह ने अपनी एक क्लास के दौरान अपने स्टूडेंट्स को ऐसे मोबाइल ऐप डिवेलप करने की चुनौती दी थी, जो यूजर को सेहतमंद बने रहने में मददगार साबित हो सकें। उनकी टीम ने जो ऐप तैयार किए, वो यूजर को तयशुदा वक्त या जगह पर मेसेज भेजते थे। सिंह की ओर से जारी रिलीज के मुताबिक, इस मुहिम के तहत सीनियर सिटीजंस के लिए 'बैलेंस' नाम का एक एप तैयार किया गया, जिसकी मदद से यूजर आसान तरीके से नियमित तौर पर कसरत से जुड़े छोटे-छोटे विडियो देख सकता है। 'वीएडिशन' नाम के ऐप के जरिए महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान तमाम टिप्स मिल सकते हैं, जबकि 'जॉगल' ऐप के जरिए आर्ट, पोइट्री और म्यूजिक से जुड़कर यूजर अपनी क्रिएटिविटी को बढ़ा सकता है।

केजरीवाल को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर शुक्रवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में केजरीवाल के खिलाफ दायर मानहानि के एक मामले में आए दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस आदेश पर भी रोक लगा दी है, जिसमें केजरीवाल को इस बात की अनुमति दी गई थी कि वह केंद्रीय कानून मंत्री कपिल सिब्बल के बेटे अमित सिब्बल द्वारा दायर मानहानि के मुकदमे में अपने को बरी किए जाने के लिए निचली अदालत से संपर्क करें।

केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का यह मामला 15 मई, 2013 को हुए एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से संबंधित है, जिसमें केजरीवाल ने कहा था कि अमित वोडाफोन की तरफ से वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे, जबकि उनके पिता उस समय टेलिकॉम मिनिस्टर थे।


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उपराज्यपाल पर 'आप' का बड़ा हमला, कांग्रेस के एजेंट बताया

जन लोकपाल बिल को केंद्र की मंजूरी के बिना सीधे विधानसभा में पेश करने को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार अड़ गई है। इसके लिए केंद्र सरकार से उलझने के बाद 'आप' ने अब उपराज्यपाल नजीब जंग को टारगेट पर ले लिया है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि उपराज्यपाल कांग्रेस के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं। पार्टी प्रवक्ता आशुतोष ने कहा कि लोकपाल बिल को लेकर उपराज्यपाल और सॉलिसिटर जनरल के बातचीत लीक कैसे हुई।

दरअसल, सरकार जनलोकपाल बिल को सीधे विधानसभा से पास कर लागू करना चाहती है, लेकिन देश के सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन ने स्पष्ट कर दिया है कि बिल को विधानसभा में पेश करने से पहले उपराज्यपाल और केंद्र से मंजूरी जरूरी है। सरकार का तर्क है कि यह बिल फाइनैंस से जुड़ा नहीं है, इसलिए इस प्रकार की मंजूरी जरूरी नहीं है। इसके अलावा बिल लागू करने को लेकर वह संविधान विशेषज्ञों से भी राय ले चुकी है। फिलहाल बिल पर 'संघर्ष' बढ़ता ही जा रहा है। इस मसले पर आज मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल उपराज्यपाल से मिल रहे हैं तो कांग्रेस नेता भी इसी मसले पर सरकार की जिद को लेकर उपराज्यपाल से मिलेंगे।

इस बिल को लेकर उपराज्यपाल ने सॉलिसिटर जनरल से राय मांगी थी। उनका कहना है कि संसद से पिछले साल पास हो चुका लोकपाल और लोकायुक्त कानून लागू हो चुका है। ऐसे में दिल्ली में लोकपाल बिल लाना केंद्र के कानून के खिलाफ होगा। इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी लेने की जरूरत होगी। इसका अर्थ यही निकलता है कि यह बिल उपराज्यपाल के पारित करवाकर ही उसे राष्ट्रपति के पास भेजना होगा। इस पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सुबह कहा कि उन्होंने संविधान विशेषज्ञों से इस बिल पर राय ले ली है और वह इस राय को उपराज्यपाल तक पहुंचाएंगे।